शिरोमणि पंजाब फोरम ने शिरोमणि अकाली दल के 8 अगस्त, 2026 के प्रस्ताव का इस सीमा तक स्वागत किया है कि इसने लंबित परिसीमन विधेयक (डेलिमिटेशन बिल) और महिला आरक्षण विधेयक पर सार्वजनिक बहस को फिर से खोला है। एक ऐसी बहस जिसे फोरम लंबे समय से यह मानता आया है कि इन विधेयकों के संसद की कार्यसूची में वापस आने तक टाला नहीं जाना चाहिए। फोरम यह भी रेखांकित करता है कि इस प्रस्ताव में पंजाब से जुड़े दो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं और अकाली दल से बिना किसी और विलंब के दोनों को स्पष्ट करने का आग्रह करता है।
पहला प्रश्न – अकाली दल वास्तव में किस फॉर्मूले का समर्थन करता है?
प्रस्ताव में “सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने वाले न्यायसंगत एवं समतापूर्ण परिसीमन” की बात कही गई है और “सभी राज्यों की सीटों में 50% की समान वृद्धि” के प्रस्ताव का समर्थन किया गया है। परंतु संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026, जैसा कि इस वर्ष अप्रैल में वास्तव में पेश किया गया था – जिसका स्वयं अकाली दल ने उस समय विरोध किया था – राज्यों को सीटें 2011 की जनगणना की जनसंख्या के आधार पर आवंटित करता है, न कि किसी सरल एवं समान वृद्धि के आधार पर। इस आधार पर, पंजाब की लोकसभा सीटों की संख्या स्वतंत्र रूप से लगभग 18 आंकी गई है, जिसमें राज्य की हिस्सेदारी वर्तमान 2.39 प्रतिशत से घटकर लगभग 2.12 प्रतिशत रह जाएगी। केवल एक वास्तविक रूप से समान 50 प्रतिशत वृद्धि – जो सापेक्ष जनसंख्या की परवाह किए बिना लागू हो – पंजाब को 20 सीटों पर बनाए रखेगी और उसकी मौजूदा 2.39 प्रतिशत हिस्सेदारी सुरक्षित रखेगी। ये दोनों परिणाम एक ही 815 सीटों के राज्य-आवंटन पर आधारित हैं, फिर भी दोनों में अंतर कोई शाब्दिक बहस नहीं, बल्कि व्यावहारिक अंतर है। फोरम अकाली दल से आग्रह करता है कि वह स्पष्ट एवं असंदिग्ध शब्दों में बताए कि पंजाब के लिए वह इन दोनों में से किसे स्वीकार करेगा, और क्या वह इस बात पर अड़ेगा कि यह उत्तर विधेयक के संवैधानिक पाठ में ही लिखा जाए – न कि, जैसा अप्रैल में हुआ था, केवल सत्तापक्ष की मौखिक आश्वासन तक सीमित रह जाए।
दूसरा प्रश्न – एसजीपीसी का अपना रिकॉर्ड अब तक आगे क्यों नहीं बढ़ा?
अकाली दल के प्रस्ताव में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एस.जी.पी.सी.) का हवाला महिला प्रतिनिधित्व के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में दिया गया है, यह कहते हुए कि एसजीपीसी “पहले ही अपने सदन में महिलाओं के लिए आरक्षण देकर एक उदाहरण स्थापित कर चुकी है।” फोरम इंडिकेट करता है कि यह उदाहरण संसद के लिए अब मांगे जा रहे मानक से कहीं कम है: एसजीपीसी की 170 निर्वाचित सीटों में से केवल 30 – लगभग 17 प्रतिशत – महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जबकि अकाली दल लोकसभा के लिए एक-तिहाई आरक्षण की मांग कर रहा है। सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 में पहले भी केंद्रीय अधिसूचना के माध्यम से संशोधन हो चुका है, और इच्छाशक्ति के अतिरिक्त कुछ भी अकाली दल – जिसने दशकों तक एसजीपीसी पर प्रभावी नियंत्रण रखा है – को अपनी ही संस्था में आरक्षण को उसी सिद्धांत के अनुरूप बढ़ाने का औपचारिक प्रस्ताव रखने से नहीं रोकता, जिस सिद्धांत का प्रचार वह अन्यत्र कर रहा है। फोरम अकाली दल से ऐसा प्रस्ताव औपचारिक रूप से दर्ज कराने का आग्रह करता है।
फोरम की चिंताएं केवल अकाली दल तक सीमित नहीं हैं। मानसून सत्र 13 अगस्त को इस स्थिति में समाप्त हुआ कि परिसीमन विधेयक सदन के पटल पर वापस ही नहीं आया, और इसे फिर से लाने के लिए शीघ्र विशेष सत्र बुलाए जाने की अटकलें भी हैं। ऐसे में पंजाब के अन्य राजनीतिक दलों – कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई, और अन्य – ने अब तक इतनी ही स्पष्टता के साथ अपना कोई रुख सार्वजनिक नहीं किया है। फोरम इन सभी दलों से अपील करता है कि वे यह स्पष्ट रूप से और लिखित रूप में बताएं कि पंजाब के लिए सीट-निर्धारण के किस फॉर्मूले के साथ वे खड़े हैं, और क्या वे विधेयकों के दोबारा पेश किए जाने से पहले – बाद में नहीं – इसकी संवैधानिक गारंटी के लिए दबाव बनाएंगे।
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